कभी कभी इन ज़िन्दगी की राहों में .........
एक लम्हे को हसीं बनाने के लिए............,
कितने हसीं लम्हों को हम पीछे छोड़ आतें हैं ,
आज मैं ऐसी एक उचाई, एक लम्हें को हसीं बनाने के लिए..................,
जानें कितने हसीं लम्हों को मैं पीछें छोड़ आया,
आज ना जानें क्यो उस मंजील से ; जीसे पानें की बचपन से ख्वाहिश थी,
पीछे मुड़के देखा तो कितने हसीं लम्हें मेरा इंतज़ार में थकें पड़ें थें
और मैं अपनी तन्हाइयां तलाश रहा था................................
आज अचानक इस दिल को एक ख्याल आया क्यो ना......................
क्यो ना फिर से उन भुझी, थकी पड़ी लम्हों को, एक जान देने की कोसिस की जाएं ....................
और दोस्तों ............ आज मैंने उसी की सुरुआत की ............
आपका दोस्त
दिग्विजय सिंह
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